संदेश

हमार मन

कईसन बा मन चंचला क्षण में खिल जाला, क्षण में मउर जाला, सुख में खुब हंसेला दु:ख में हो जाला बयाला ई सुकुवार फूल होला क्षण में कुम्हीला जाला खुश होखे त बन जाला गोलगप्पा दुख में बन जाला चुप्पा, कबो कहे 'दुनिया हऽ हमार, कबो कहे 'जगत से का नाता हमार! हमरा मन के कवन इ हाल अपने कईलस जीयल मुहाल उ घमंड से भईल पैदा एही से हरमेशा रहे बेहाल बहुते कसनी मन के चाल, अब ले समझ नाहीं पावल, जे बा माटी से निकलल, फेर माटी में ही जाला घुल! कहस ठेठबिहारी सुनऽ सजनी मानऽ तु हमरी कहनी मन के कर अबो कस में ना त होखी जिनगी के रजनी

रात के बतिया

रात कईसे कटल कुछऊ पता नईखे तहरा नैना से कतना पिहनी पता नईखे बितल रात भईल भोरहरीया, का भईल रतिया कुछऊ पता नईखे जाऐब कंहवा जानत नईखीं धऽ ले हंथवा केहू की सुधि नईखीं नैनन के बरसात में बीतल बा रात कब देखनी हम बरखा जानत नईखीं के जानऽता की का तुरले बाडू  दिलवा हमार कि पैमाना तुरले बाडू पतर गईल बा हमरो जज्बात कईले कवन तु जादू बाडू कईसे कहीं की तु बेवफा बाडू जब अंखियन से ही हमके पियवले बाडू रात कईसे कटल कुछऊ पता नईखे का तुं पियवलु बुझात नईखे ठेठबिहारी के नशा चढ़ल बा अतना कि अबहीं ले कुछु लिखात नईखे राम प्रकाश तिवारी 'ठेठबिहारी'

कुछु लिखीं बाकिर भोजपुरी लिखीं

तुलसी के राम लिखीं चाहे कबीरा के गान लिखीं सूर के श्याम लिखीं, बुद्ध के ज्ञान लिखीं चाहे महावीर के नाम लिखीं कुछु लिखीं बाकिर भोजपुरी लिखीं। आरा,बलियां, छपरा चाहे सिवान लिखीं धरती चाहे असमान लिखीं कुछु लिखीं बाकिर भोजपुरी लिखीं । कुंवर सिंह के ललकार लिखीं मंगल पांडे के यलगार लिखीं चित्तु पांडे के नाम लिखीं चाहे अब्दुल हमीद महान लिखीं कुछु लिखीं बाकिर भोजपुरी लिखीं । अरेराज महादेव लिखीं चाहे गौतमस्थान लिखीं मेंहदार के महेंद्रानाथ लिखीं चाहे काशी विश्वनाथ लिखीं कुछु लिखीं बाकिर भोजपुरी लिखीं। आमी भवानी लिखीं, चाहे मइहर महारानी लिखीं आइरन माई लिखीं चाहे थावे के कहानी लिखीं कुछु लिखीं बाकिर भोजपुरी लिखीं। गंगा के धार लिखीं, सरयू के किनार लिखीं चाहे गंडक आ कोसी के दहार लिखीं कुछु लिखीं बाकिर भोजपुरी लिखीं । सोनपुर के रेला लिखीं बनियापुर के खेला लिखीं चाहे ददरी के मेला लिखीं कुछु लिखीं बाकिर भोजपुरी लिखीं । मुसहरी के पेड़ा लिखीं बनियापुर के मीठा के जलेबी लिखीं बनारस के पान लिखीं चाहे कुशीनगर के धान लिखीं कुछु लिखीं बाकिर भोजपुरी लिखीं। भिखारी के ...
हमरा चाहीं आजादी   हमरा चाहीं आजादी हं हमरा चाहीं आजादी आजादी चाहीं अशिक्षा से भूखमरी आऊर गरीबी से हमरा चाहीं आजादी चाहीं आजादी आतंकवाद से देश के गद्दारन से नेतवन के झूंठा भाषण से देशवा में लहकत अंगारन से दहकत नदी के किनारन से हमरा चाहीं आजादी सीमवा पर बरसत गोलन से खाए के तरसत बचवन से घर में रहत सपोंलन से अंचरा के बेधत दोगलन से हं हमरा चाहीं आजादी माई के नांव पर कटात बेटवन से लचकत कमरिया पर बरिसत नोटवन से कचहरी में बेचात करीया कोटवन से चुनाव में बोतल से बदलात वोटन से हं हमरा चाहीं आजादी उड़े के सपनवन के रोकत गोड़वन में पड़ल बेड़ियन से संच्चाई लिखे से रोकत हथकड़ीयन से दहेज में जरत पतोहियन से कोख में मुअत बेटियन से हं हमरा चाहीं आजादी खुन में सउनाईल कशमीरी सेबन से मौत बांटत जहरीला पनीयन से दुनिया के मिटावे के तइयार बारूदी बगीचवन से दुश्मन के नापाक इरादन से हं हमरा चाहीं आजादी   जातीपाती के नांव पर होखत दंगन से रोटी कपड़ा के रोवत भिखमंगा देहियन से मजलूमन के पेरत दबंगन से इज्जत के लूटत लफ...

गोधन आ रेंगनी के कांट

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गोधन आ रेंगनी के कांट गोधन के प्रतिकृती रेंगनी के कांट काल्ह दियरी   रहे आ सभ केहु बहुते जोर-शोर आ खुशी से इ त्यौहार मनावल। आज अब गांव घर में माई बहिनी गोधन पारी लोग ओही जा घर के मर्दाना लोग के डिप्टी लागी रेंगनी के कांट खोजे के, काहे कि आपन-आपन भाई-भतिजा के सरपला के बाद मेहरारु आ लइकी सभ एही रेंगनी के कांट अपना जीभ पर गड़ावेला लोग आ अपना के दंड देवेला लोग। हम जानत बानी की रउआ सभे इहे सोंचत होखेब की हम इ भोरे-भोरे का लेके बईठ गईनी, त साहेब इ बात हम ऐसे कह रहल बानी कि दियरी आ गोधन के बाद चार दिन चले वाला प्रकृति पूजा के सबसे बड़हन परब छठ शुरू हो जाला। जहां दियरी के तइयारी में हमनी अपना घर-दुवार के साफ-सुथरा करिले सन आ घर के कचरा कबाड़ निकाल के बहरी फेंकी ले जा, बाकिर नदी-नाहर आ पोखरा के घाटन के साफा कइल भूला जाईले जा, एही के ध्यान में राख के हमनी के पुरखा-पुरनिया लोग गोधन में रेंगनी के कांट के उपयोगिता के शुरुवात कईल लोग। रेंगनी के कांट के विशेषता ह s की इ साफ-सुथर जगहा पर ना होखे ला, इ हरमेशा गंदा गोबर-गोथार आ काई-किच आला जगहा होला। जब हमनी एकरा के खोजत गांव...

आईल बसंत

आईल बसंत जब से चढल बसंत मन में खुशी भईल अपार बितल पतझड़ आईल बहार कि छछनत जिया के मिली अब करार कहीं लता-पता लपिटाए तरुवर से, जईसे नदी मिले सागर से।। त देखी के ई मिलन भरि लोरवा दुनु नयन कहीं मनमें गोरी करे विचार असहीं होई पिया से कबो मिलनवा हमार, बारह बरिस से पिया रहले बहरा ना जाने कहीया भेंटब हमरा कब उ शुभ दिन आई, पिया के बोलिया सुनाई बड़ा रे जुलुमी रउओ ठेठबिहारी कईसे हम तोहे मन के पीर समुझाईं की अब त घरवा आंई ए बलम हमहूं रऊवा संगवा फगुआ मनांई।।

यूपी को ये साथ पसंद है।

यूपी को ये साथ पसंद है।  हां यूपी को ये साथ पसंद है, क्योंकि नौटंकी में इसका कोई सानी नहीं है। हां यूपी को ये साथ पसंद है, क्योंकि पप्पू और बबूआ सा नादान कहीं और नहीं है हां यूपी को ये साथ पसंद है, क्योंकि चोरी-चकारी सीनाजोरी में  बहन-बेटीयों की इज्जत की रखवारी ही इनसे जरूरी है हां यूपी को ये साथ पसंद है, फटा कुर्ता और पंचर साईकिल वाले  जोकर इनसा कोई और नहीं है हाथ का साथ गरीबों की जेब साफ और भाई-भतिजों के सारे गुनाह माफ  इनसा परिवारवाद व भाई-भतिजावाद कहीं और नहीं है। हां यूपी को ये साथ पसंद है, कुर्सी को बचाने में सब कुछ झोंकना  लोभ-प्रलोभन, और तुष्टिकरन करने वाला इनसा कोई और नहीं है  इसिलये यूपी को ये साथ पसंद है  भाई हमको तो नमो की चाय पसंद है थोडी कड़वी थोड़ी मीठी चाय है प्रदेश को बचाने और आगे बढाने को  अब सब एक राय हैं गुंडाराज भ्रष्टाचार और भाई-भतिजावाद की सरकार हटाना है।  हां यूपी को ये साथ पसंद है, क्योंकि इस को लखनऊ नहीं  मुम्बई ही भेजना है तो कहे ठेठबिहारी अब की है  भाजपा की बारी मोदी और शाह की जोड़ी पसंद है