आईल बसंत
आईल बसंत
जब से चढल बसंत मन में खुशी भईल अपार
बितल पतझड़ आईल बहार
कि छछनत जिया के मिली अब करार
कहीं लता-पता लपिटाए तरुवर से,
जईसे नदी मिले सागर से।।
त देखी के ई मिलन
भरि लोरवा दुनु नयन
कहीं मनमें गोरी करे विचार
असहीं होई पिया से कबो मिलनवा हमार,
बारह बरिस से पिया रहले बहरा
ना जाने कहीया भेंटब हमरा
कब उ शुभ दिन आई, पिया के बोलिया सुनाई
बड़ा रे जुलुमी रउओ ठेठबिहारी
कईसे हम तोहे मन के पीर समुझाईं
की अब त घरवा आंई ए बलम
हमहूं रऊवा संगवा फगुआ मनांई।।
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