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सावन लागे सोहावन
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जब से चढल बा सावन सोहावन लागे इ हमरा, बाकी का कहीं हम भइल का हमार हाल कि जब से गइले पिया परदेस, हो तब से ही भइल बुरा हाल हमार, पडे जब बुनी के फुहार, हो पडे जब बुनी के फुहार, लागे तन बदन में अगिया हमरा मन में बाज उठे विरहा के तार लागे केहु कइसहुं मिलवा दे पियवा हमार जीनगी भर पुजेब चरनीया ओकर, जे करा दीही पिया से मिलनवा हमार हो सखी का कहीं हम तहरा से कइसे कटे रतीया हमार, बीते रतीया बदलते करवटीया खटीया पर पिया जी के इन्तजार में तरसे नैनाहमार हो बाकी उ निर्मोहीया ना अइले छोडी के सहरीया के नोकरीया की बीते लागल सावन के महीनवा सोहावन अइसहीं करत रहनी मनवा में विचार, बइठी के अंगनवा में भोरे भिनुसरवा की कहींसे आइल एगो काग करीया, बईठ के बोले लागल छनीया, त मन में जागल एगो आस की, अइहें अब पियवा हमार, अतने में सुननी रे हम पिया जी के बोलिया बहरा लागल हमरा अचकामें एगो झटका की कहीं मार मनवा त नाहीं बउराए लागल सोचते रहनी अपना मनवा में इहे तबले देकनी की संइया मोरो हो कीराजा मोर आइगले बहरा से घरवा की लागे अब सावन सोहावन हमरा त अइला से "ठेठबिहारी" जी के घरवा हमु खेलब अब सईंया से झिझरी बहरीया।
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किस्सा कुर्सी के अरे बड़ा रे अजब हटे इ किस्सा कुर्सी केजे सुनल उहो पछतावे जे न सुने उहो मछियाये। आरे इ किस्सा सुनी के बहुते आपन भाग राजनीती में परिख्लेकेहू के मिलल कुर्सी त केहू लिहले मुहे माटी आजे के न हटे इ बात हटे बहुते पुरानकुर्सी खातिर माई बेटा के भेजली बनवा में आ कुर्सिये खातिर लडले कौरव पांडव कुरुक्षेत्र के मैदान में आ कुर्सिये खातिर भइल देशवा में अंग्रेजन संगे मार. इ कुर्सी के महिमा बा बहुते महान त कहस कवी ठेठ बिहारीकी भईया पडीय न कबो कुर्सी के फेरा में हो कुर्सी के फेरा में.
दोस्त आ ओकर मतलब
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हमरा खातिर दोस्त के मतलब हम दोस्ती करे के बेर इ सोचले भी न रहनी की... ख़ुशी भी दोस्त से होखी आ गम भी दोस्त से होखी तकरार भी दोस्त से होखी आ प्यार भी दोस्त से होखी खिसिइबो करेब दोस्त से आ मनबो करेब दोस्त से ओरहनो दोस्त से होखी आ मिशालो दोस्त के होखी सबेरो दोस्त से होखी आ सांझी भी दोस्त से होई जिनगी के शुरुवातो दोस्त से होई आ जिनगी में मुलाकातो दोस्त से होई मोहब्बत भी दोस्त से बा आ इनायतों दोस्त से ह कामो दोस्त से ह आ नामो दोस्त से ह ख्यालो दोस्त के ह आ अरमानो दोस्त से ह ख्वाबो दोस्त से ह आ सांचो दोस्त से ह महफिलो दोस्त से ह आ माहौल भी दोस्त से ह मुलाकातो दोस्त से ह आ बिछोह भी दोस्त से ह जिनगी में बिरानी भी दोस्त से ह आ जिनगी में हरियरी भी दोस्त से ह चाहे इ कहलs इयार की आपन त दुनिए दोस्त से ह
जिंदगी का सार
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"सब ख़ुशी बा लोगन के अंचरा मे, बाकिर एगो हंसी खातिर वक़्त नइखे। दिन रात दउरेले दुनिया मे बाकिर, ज़िन्दगी बदे वक़्त नइखे , माई के लोरी के अहसास त हवे लेकिन , माई के माई कहे के फुर्सत नइखे सभ रिश्ता-नाता के त हमनी मार दिहले बानी जा, अब उनहन के माटीयो देवे के भी सवांस केकरा बा। सभ नाम त मोबाइल मे भरल ह बाकिर दोस्ती खातिर वक़्त कहाँ बावे। हम दोसरा के का बात करीं , जब अपने खातिर सवांस नइखे अंखिया त भरल बा जे अन्घी(नींद) से भारी, बाकिर सुते के बेरा कहंवा बा । दिलवा बा दरदिया से भरल बाकिर, रोवे के फुर्सत कहंवा बा? पैसा के दौर में दौरत बानी अइसन...कि की थाके के फुर्सत कहाँ दोसरा के एह्सासन के का मोल करीं हम , जब अपने सपन्वन खातिर ही सवांस नइखे अपने बताव ऐ जिनगी, एह जिनगी के का होखी की, हर दम मुवे वालन के त जिए के भी सवांस नइखे......" आ अंत में जिनगी के हमार एगो नजरिया एह आखिरी चार लाइनन में, "कि मुश्किलन से भागल आसान होला, हर पल जिनगी के इम्तिहान होला, डेराये वाला के मिलल न कुछो जिनगी में, आ लड़े वाला के त कदम में जहान होला, त कहस कवी ठेठ बिहारी कि बा आजु के जिंदगी के इहे फलसफा, ...
खुलल पोल
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खुल गइल पोल खुल गइल पोल अरे सब सरकारी दावा के, खुल गइल पोल, देश के मुखिया लोग के कगला के देर ना भइल की थोडके देर में भइल धमाकन से फेरू खुल गइल पोल एक ओर प्रधानमंत्री कहस कि सुरक्षा व्यवस्था बाटे देश के चाक-चौबंद। त तुरतले होला धमाका पांचसात गो धमाकन से सरकार के खुलेला पोल अइसे जइसे फाटेला कौनो ढोल़क के खोल तएतने पर कहस कवि ठेठ बिहारी कि खुल गइल पोल