जिंदगी का सार


"सब ख़ुशी बा लोगन के अंचरा मे,


बाकिर एगो हंसी खातिर वक़्त नइखे।


दिन रात दउरेले दुनिया मे बाकिर,


ज़िन्दगी बदे वक़्त नइखे ,




माई के लोरी के अहसास त हवे लेकिन ,


माई के माई कहे के फुर्सत नइखे


सभ रिश्ता-नाता के त हमनी मार दिहले बानी जा,


अब उनहन के माटीयो देवे के भी सवांस केकरा बा।




सभ नाम त मोबाइल मे भरल ह


बाकिर दोस्ती खातिर वक़्त कहाँ बावे।


हम दोसरा के का बात करीं ,


जब अपने खातिर सवांस नइखे


अंखिया त भरल बा जे अन्घी(नींद) से भारी,


बाकिर सुते के बेरा कहंवा बा ।


दिलवा बा दरदिया से भरल बाकिर,


रोवे के फुर्सत कहंवा बा?


पैसा के दौर में दौरत बानी अइसन...कि


की थाके के फुर्सत कहाँ
दोसरा के एह्सासन के का मोल करीं हम ,


जब अपने सपन्वन खातिर ही सवांस नइखे


अपने बताव ऐ जिनगी,


एह जिनगी के का होखी की,


हर दम मुवे वालन के


त जिए के भी सवांस नइखे......"


आ अंत में जिनगी के हमार एगो नजरिया एह आखिरी चार लाइनन में,




"कि मुश्किलन से भागल आसान होला,


हर पल जिनगी के इम्तिहान होला,


डेराये वाला के मिलल न कुछो जिनगी में,


आ लड़े वाला के त कदम में जहान होला,




त कहस कवी ठेठ बिहारी कि बा


आजु के जिंदगी के इहे फलसफा,


बनिह न कबो जिनगी में तू अपना, अइसन...


कि कहे के पडो तहरो इ बात कि जिनगी में मिलल सब कुछ,


मिलल ना त बस चैन आ आराम के कुछ पल
........राम प्रकाश तिवारी "ठेठ बिहारी"..........

टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
बहुत बढ़िया।
आपकी तस्वीर को देख के लगता नहीं की ये आपकी रचना है

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साकी

हंऽ हम भाषा भोजपुरी हईं

रात कईसे कटल नइखे कुछऊ पता