चढ़ते सावन बरसे बदरवा

चढ़ते सावन बरसे बदरवा , प्यास बुतावे धरती के
बाकि तरसे मोर करेजवा , याद दिलावे परती के

उमड़-घुमड़ के बरसे बदरी , आँखिन गंगा-जमुना धार
ए साजन तू सोझा नइखऽ , बोलऽ कइसे करीं सिंगार

घोर अन्हरिया बिजुरी चमके , दिल में धड़का लागेला
बिना कराही चढ़ले तन में , बालम तड़का लागेला

हरियर साड़ी हरियर चूड़ी , बाकी मन हरियर ना भइल
आवे के कहलऽ होली में , बाकी इहाँ सवनवो गइल

एगो बात बतलाव बालम , का कवनो से बाटे लाग
इहँवा गीत बिरह के गाईं , उहँवा तू मनफटुआ राग

साँच बात हम कहीं सवनवा , सावन लागे बहुत सुहावन
चारो ओर हरियाली छवलस , रंग बा धरती के मनभावन

चाह पकउड़ी बइठल खइबऽ , मुसहरी बजार के पेड़ा
आवते तोहरा लागे लागी , फफसल फसल में रेंड़ा

शहर में कादो दूध ना मिले , अनघा मिलल रहेला पानी
इहँवा लगहर तीन मथुरही , हीक भर पियल करीह जानी

मिली सजावल छलिहर दही , कहबऽ तऽ छेना फारब
तेल फुलेल लगाय रतिया में , खरकटल रूपवा सँवारब

दिल्ली में दिलदार बनेलऽ , बुद्धि के बाटे बलिहारी
हमरा चाहीं मटिगर मरदा , होखे ऊ ठेठ बिहारी

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