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दिसंबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रात कईसे कटल नइखे कुछऊ पता

रात कईसे कटल नइखे कुछऊ पता पियनी अँखिया से केतना पता ना चलल भोरे पसरल किरिनिया कपारे चढ़ल केतना मस्ती भइल बा पता ना चलल। । के सम्हारी समझ के परे जिन्दगी केहू हँथवा पकड़ ले करीं बंदगी रात नैना से केतना बहल नीर बा मन दहाईल बा कहँवा पता ना चलल।। तोहार पैमाना का बा दिल तूरे खातिर काहें भइलु तू निरमोही जुलुमी शातिर आँख से आँख जबसे मिलल बा प्रिये खुद हेरा गइनी कब से पता ना चलल। । ठेठ हमरा के लोगवा बिहारी कहे हमरा दिलवा के कोना भोजपुरी रहे माई तोहरे चरनिया में चहकत बढ़ल कब दो हो गइनी ओजगर पता ना चलल रामप्रकाश तिवारी

कइसे मनाईं हम त्योहार राखी के,

कइसे मनाईं हम त्योहार राखी के, लउकत नइखी कोंख में पुतरी आँखि के । कइसे बुझाई हमरा प्यार राखी के, रहत नइखे बहिनिया सोझा आंखि के।। लूटता इज्जत दुशमनवा दुःशासन टुकुर टुकुर ताकता पबलिक प्रशासन जननी हीं जननी के दरद ना जानस करेली बनके मलकिनी सिरशासन पीट पीट छाती रोवे रोज बाबु माई लोगवा बनल बाटे बड़हन कसाई गली गली घूमेला भेड़िया भयंकर कहाँ से बोलाई अब किसन कन्हाई बाबा चाचा बाप भाई रूप धइलस पपीया शूल बा करेजवा में फाटतारे छतिया केकरा से बहिनी के इजति बचाईं बाटे दरवान बाकी करता ऊ घतिया माई बहिनी बेटी के लोग गरियावता बेटा आ बेटी से कोंख फरियावता मिली ना बहुरिया जब बेटी बिलखिहें अपने जिनिगिया लो अगिया लगावता होखे चाहीं सगरी बेटी के सम्मान   तबे बनी देशवा आपन महान बेटा आ बेटी में फरक नइखे कवनो दुनो के मानल जाय एके समान 

चढ़ते सावन बरसे बदरवा

चढ़ते सावन बरसे बदरवा , प्यास बुतावे धरती के बाकि तरसे मोर करेजवा , याद दिलावे परती के उमड़-घुमड़ के बरसे बदरी , आँखिन गंगा-जमुना धार ए साजन तू सोझा नइखऽ , बोलऽ कइसे करीं सिंगार घोर अन्हरिया बिजुरी चमके , दिल में धड़का लागेला बिना कराही चढ़ले तन में , बालम तड़का लागेला हरियर साड़ी हरियर चूड़ी , बाकी मन हरियर ना भइल आवे के कहलऽ होली में , बाकी इहाँ सवनवो गइल एगो बात बतलाव बालम , का कवनो से बाटे लाग इहँवा गीत बिरह के गाईं , उहँवा तू मनफटुआ राग साँच बात हम कहीं सवनवा , सावन लागे बहुत सुहावन चारो ओर हरियाली छवलस , रंग बा धरती के मनभावन चाह पकउड़ी बइठल खइबऽ , मुसहरी बजार के पेड़ा आवते तोहरा लागे लागी , फफसल फसल में रेंड़ा शहर में कादो दूध ना मिले , अनघा मिलल रहेला पानी इहँवा लगहर तीन मथुरही , हीक भर पियल करीह जानी मिली सजावल छलिहर दही , कहबऽ तऽ छेना फारब तेल फुलेल लगाय रतिया में , खरकटल रूपवा सँवारब दिल्ली में दिलदार बनेलऽ , बुद्धि के बाटे बलिहारी हमरा चाहीं मटिगर मरदा , होखे ऊ ठेठ बिहारी

कईनी कवन कसुर

कइनी कवन कसूरवा ए बाबा , मिलली कलही घरनी । हरदम नाच नचावे ए बाबा जइसे चक्कर घिरनी ।। संग सेजरिया सुते के बेरिया सखियन से बतियावेले । देखा देखा के अँखिया हमके तन में आग लगावेले । बोलेले खरुआ के ए बाबा जइसे खोदल बिर्हनी ।। फेरा के फेर में पड़के फफकीं फूटल करम हमार हो छने छने घोंघियाले घर में सभके बथेला कपार हो देके दहेजवा दगलस ए बाबा बाउर ओकर करनी ससुरारी में ससूरजी के देखनी हम दुरगतिया ससुई हमरो जिनिगी में दिहलसि बड़का भारी बिपतिया चउका बरतन पोछा ए बाबा घरवा के होखे बहरनी माई से गुन सिखले बिया सभके फोरी महमंड हो नइहर के ऊ हीयऽ दुलारी पइसा के बाटे घमंड हो फुफुती उठाके गरजे ए बाबा जइसे गरजे शेरनी तऽ रोई रोई कहसऽ ठेठबिहारी  करवा ई दुनु जोरी कइनी कवन कसूरवा ए बाबा  मिलली कलही घरनी।।