जब से चढल बा जवानी, हो कि जब से चढल बा जवानी रानी भईली दिवानी। दिन-रात मांगस खाली पिये के पानी सोचहीं में बीते उनकर जिंद़गानी, करीं कवन जतनवा, मान जईते जे मोर खिसियाईल सजनवा, लिहीं कवना जादो-टोनवा के सहारा की आ जईते घरवा हमरो ठेठ बिहारी बलमऊवा, रहत भईले जेकरा सालभर बहरवा, कहीं बीत न जाओ ईहो रे फगुनवा ईहे सोंच के छुटेला रानी के माथे पसेनवा कि जब से चढल बा जवानी, रानी भईली दिवानी।। चढते फगुनवा लागे जरे विरह अग्नि में तनवा की अईले नाहीं मोरो रे बलमुआ, की मन मोरा लागे बउराए हो राम करा द संईया से मिलनवा कि जब से चढल बा जवानी, रानी भईली दिवानी।। नाहीं अईले सजनवां त लागे काहे आईल बैरी फगुनवा