साकी
आपन जुठ जे कभी हमके पिया देलs, लबे -साग़र, ‘लबे -साक़ी’ के मजा देला। तहरा मस्ती के हाल अजब देखले बानी, शराब पिये से पहिले सुरुर होखेला। धोखा से पिया देले रहीं, एहू के दू घूँट, पहिले से नरम बा, वायज़ के ज़बाँ अब। करवट लेवेे ला फूलन में शराब, हमसे एह फ़स्ल में तौबा होखी? साक़ी,हेने त देखs हमहूं देर मस्त बानी, कुछ निगह-ए-मस्ती भी मिला दs शराब में । पियत जाईं हम जाम पर जाम भी, लेत जाईं साक़ी तहार नाम भी। जे छीन के पी सकता, पी लेता अब त, मैखाना में ए भाई, नया रीत चलल बा। पिये वाला के नाम भी ना बांचल मैखाना बा उदास, कि साक़ी ना रहल । ई असर उनका पर भइल, सोहबते- मस्ताना के, निहुर के मुँह चूम लिहलख शीशा पैमाना के। बेखुदी में एगो मयकश, कह गइल राज़े–दिल, आज तक ऐ दोस्त, सारा मयकदा बदनाम बा। दिल मिलल शीशा से, आँख लड़ल पैमाना से, हम कहाँ जाएब साक़ी,तहरा मैखाना से। पिया दs अंजुरी से साक़ी, जे हमरा से नफ़रत बा, प्याला ना देबs, मत दs, शराब त दs। हिया के आग बुताये, जेसे, जल्दी उ पानी लेआवs, लगा के बर्फ़ में साक़ी, सुराहिये-मय’ लेआवs।

टिप्पणियाँ