गुरु का ऋण
आदरणीय पाठकगण, सादर प्रणाम एक बार फिर से हाजिर हुं आपकी सेवा में अपनी रचना को लेकर " गुरु ब्रम्हा गुरु विष्णु गुरु देव महेश्वर । गुरु साक्षात् परब्रह्म, तैस्मय: श्री गुरुवे नमः"।। कैसे करु मैं शुक्रिय़ा अदा आपका नहीं हैं अल्फ़ाज आज मेरे पास बन पाया हुं जो कुछ भी मैं आज है सम्भव हुआ कृपा से आपकी क्योंकि- मैं तो था निराकार मिट्टी का माधो, मुझको दिया आपने रुप आकार देके मुझे ज्ञान रुपी अपना प्यार, ठीक वैसे ही- जैसे बनाता मिट्टी का बर्तन कोई कुम्हार कर के जतन लाख हजार। ज्यों तपकर ही सोने में आती है लालिमा, वैसे ही परिक्षा में अपनी तपाकर किया, आपने मुझे तैयार,ताकी कर सकुं मैं भविष्य की दुश्वारियों का सामना।। जो न ऐंठा होता आपने मेरा कान तो भला कैसे सुनता आज जग मेरा गान कैसे उतार पाऊंगा मैं आपका वो ऋण जो दिया आपने मुझे ज्ञान के रुप में चाहे लेके जन्म हजार करुं मैं समस्त जीवन बलिदान। लेकिन तब भी देखिये मेरी ये धृष्टता आज भी हुं मार आपसे खाना चाहता क्योकि अनुसाशन क...